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शनिवार, दिसंबर 07, 2013

इसी मोड़ से है निकल गया कोई नौजवाँ और कुछ नहीं

ये मक़ाम भी है पड़ाव ही मिला सब यहाँ और कुछ नहीं
कोई राह तन्‌हा सी दिख रही है जूँ कारवाँ और कुछ नहीं

थे सटे सटे से वो फ़ासले है हटा हटा सा ये अपनापन
मेरी ज़िन्‍दगी की है मौज़ यूँ ही रवाँ रवाँ और कुछ नहीं

कोई रौशनी किसी रात का जो हसीन ख़्वाब जला गयी
हुई सुब्ह तो था हुज़ूम भर व बयाँ बयाँ और कुछ नहीं

अरे! कोह की वो बुलंदियाँ और वादियों का वो गहरापन
खुली आँख तो मुझे दिख रहा है धुआँ धुआँ और कुछ नहीं

ये जो गर्द इतनी है उड़ रही इसे देख कर न हों बदग़ुमाँ
इसी मोड़ से अभी है गया कोई नौजवाँ और कुछ नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

26 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (07-12-2013) को "याद आती है माँ" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1454 में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  3. वाह भई गाफ़ि‍ल जी बहुत बढ़ि‍या

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  4. कोई रौशनी किसी रात का जो हसीन ख़्वाब जला गयी
    फिर सहर थी, अख़बार थे व बयाँ बयाँ और कुछ नहीं

    ये जो गर्द अब तक उड़ रही इसे देख कर हैराँ न हो
    इसी मोड़ से गुज़रा है फिर कोई नौजवाँ और कुछ नहीं

    हाँ नहीं तो!

    रवानी है गज़ल में ज़िंदगानी है ,किसी शायर दुनिया का जला हुआ , की पूरी कहानी है।

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...उम्दा ग़ज़ल गाफ़ि‍ल जी

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  6. शुक्रिया गाफिल भाई। ग़ालिब हो गई आपकी गज़ल हमपे।

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  7. बहुत सुन्दर ,उम्दा ग़ज़ल गाफिल जी तहे दिल से दाद देती हूँ

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  8. कोई रौशनी किसी रात का जो हसीन ख़्वाब जला गयी,
    फिर सहर थी, अख़बार थे व बयाँ बयाँ और कुछ नहीं।

    बहुत सुन्दर ग़ज़ल.....मर्मस्पर्शी.....

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  9. मुझे ख़ुशी हुई आभार आपका बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ......

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  10. यूँ सटे सटे से ये फ़ासले नज़्दीकियाँ यूँ हटी हटी,
    यूँ ठहर रही मेरी ज़िन्दगी गो रवाँ रवाँ और कुछ नहीं..कमाल कीक्या ग़ज़ल सर जी ..इस शेर के तो क्याकहने ..सटे सटे से फासले .....नजदीकियां यूं हटी हटी ..क्या बात है ...वाहहह ह ह ह ह ह ह ह

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