फ़ेसबुक पर अनुसरण करें-

ग़ाफ़िल

My photo
Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Sunday, January 25, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : जफ़ाएँ भी इरादों को बहुत मज़्बूत करती हैं

1.
चुग़ली सी कर रहा है हमारे रक़ीब की,
इक झांकता गुलाब तुम्हारी किताब से।
2.
बारहा हो रहा ख़ूँगर मगर फिर भी क़शिश यह के,
तुम्हारे दर पे आ-आकर मैं अपना सर पटकता हूँ।
3.
जिस रोज़ मेरा होश भी मुझसे ख़फ़ा रहे,
उस रोज़ भी यादों का तेरे सिलसिला रहे।
4.
रात का ख़्वाब सहर को ही सुना दूँ जो कहो,
बेवफ़ा शाम तक यादों में रहे के न रहे।
5.
बारहा साबिक़ा रहता है अपना इस बहर से पर,
है जाना आज मैंने के ग़ज़ल यूँ मुस्कुराती है।
6.
फिर मेरी सरकार ने मुझ पर लगाई तोहमतें,
फिर है मेरे हाथ आया ज़हर का प्याला अभी।
7.
ख़ुदा करे के कभी शामे-वस्ल ना आए,
उसकी उम्मीद में ही ज़िन्दगी गुज़र जाए।
8.
इक दफ़ा रू-ब-रू हो जा तू ऐसी भी तमन्ना है,
तसव्वुर में तेरी तशरीफ़ गोया कम नहीं ग़ाफ़िल।
9.
वफ़ा की जुस्तजू में दर-ब-दर का भटकना भी क्या,
जफ़ाएँ भी इरादों को बहुत मज़्बूत करती हैं।
10.
क्या क़यामत है के आरिज़ उनके नीले पड़ गए
मैंने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तश्वीर का

1 comment:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (26-01-2015) को "गणतन्त्र पर्व" (चर्चा-1870) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    गणतन्त्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete