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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Sunday, February 01, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : ज़ुरूरी तो नहीं

1.
खो गयी मेरी ग़ज़ल गेसुओं के जंगल में,
जा रहा ढूढने लौटूं भी ज़ुरूरी तो नहीं।
2.
जाने ग़ज़ल करिश्मा है या भरम हमारा के तेरी,
सुह्बत में गेसू का जंगल निखरा सुथरा लगता है।
3.
है अभी शाम ढली जाम भी ढल जाने दे,
होश आएगा तो मैं भी उदास हो लूंगा।
4.
आज तो पूरा ख़ुम कर मेरे हवाले साक़ी,
कौन कमबख़्त आज होश में आना चाहे।
5.
उफ़ मेरी मज्बूरियाँ के लोग दीवाना कहें,
तेरी उल्फ़त के सिवा अब और तो चारा नहीं।
6.
ऐ ग़ाफ़िल दिल की सल्तनत अपनी,
हारकर देख फिर सिकन्दर तू।
7.
हो चुकी इब्तिदा-ए-शब चलो सपने सजाएँ कुछ,
सहर आएगी ग़ाफ़िल फिर नयी पेचीदगी लेकर।
8.
भले ग़ाफ़िल हूँ पर तेरी ही बग़िया का परिन्दा हूँ,
निगाहे शोख़ पर तेरी मेरा भी हक़ बराबर है।
9.
अगर सुर्ख़ लब ना नमूदार होते हमें याद शोलों की आई न होती,
न गुस्ताख़ होतीं निगाहें हमारी हवा गरचे घँघट उढाई न होती।
10.
नाम ले करके भला क्यों करें रुस्वा उसको,
जिसने भेजा सलाम उसको शुक्रिया अपना।

2 comments:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-02-2015) को "डोरबैल पर अपनी अँगुली" (चर्चा मंच अंक-1877) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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