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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Friday, February 06, 2015

उसको तो पता यह भी न चला

उसको तो पता यह भी न चला
उसपे बहार कब छाई है।
कब कोमल कलियाँ चटक गयीं,
कब लाज की लाली धाई है।।

कब उसका वह भोला बचपन,
इस रंगमंच से विदा हुआ;
कब चंचल चितवन चुग़लायी,
कब लट उसकी लहराई है।

इक अन्जानी ख़ुश्बू से कब,
उसका तन उपवन महक उठा;
कब मन की कोयल कूक उठी,
कब गीत प्रणय के गाई है।

कब गति-गयंद गामिनी हुई,
कब मधुपूरितयामिनी हुई;
कब यौवन-भार दबी कुचली
कृश कटि उसकी बलखाई है।

ग़ाफ़िल! इन शोख़ अदाओं का,
कब से दीवाना बन बैठा;
जब भी ये कलियाँ फूल बनीं,
अलियों की शामत आई है।।

6 comments:

  1. अति सुन्दर सर।

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 07-01-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1882 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. बहुत ही सुन्दर

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  4. वाह
    बहुत खूब ग़ाफ़िल साहब ...

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