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गुरुवार, फ़रवरी 04, 2016

मगर हर साँप आखि़र साँप सूँघे से पड़े क्यूँ हैं

नहीं है वस्ल किस्मत में मगर यूँ फ़ासिले क्यूँ हैं
गयीं खो मंज़िलें फिर जगमगाते रास्ते क्यूँ हैं

तुम्हारे पास आने के बहाने सैकड़ों हैं पर
मुझे इक दो बहाने भी नहीं अब सूझते क्यूँ हैं

दिले बह्राँ में उनके है न थोड़ी भी जगह तो फिर
मुझे वो डूबने का लुत्फ़ लेने को कहे क्यूँ हैं

न हो भी ज़ह्र फिर भी फनफनाना तो ज़ुरूरी है
मगर हर साँप आखि़र साँप सूँघे से पड़े क्यूँ हैं

चलो माना मनाने का हुनर मुझको नहीं आता
पता उनको है जब ये राज़ फिर वो रूठते क्यूँ हैं

ये लाज़िम है फिसल जाए सुख़न की राह पर ग़ाफ़िल
उठाने से रहे गर दूर से वो घूरते क्यूँ हैं

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

  1. चलो माना मनाने का हुनर मुझको नहीं आता
    पता उनको है जब ये राज़ फिर वो रूठते क्यूँ हैं

    वाह

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-02-2016) को "घिर आए हैं ख्वाब" (चर्चा अंक-2244) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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