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सोमवार, मार्च 07, 2016

हम तो यूँ ही सनम मुस्कुराने लगे

लो सुनो होश क्यूँ हम गंवाने लगे
अब रक़ीब आपको याद आने लगे

इश्क़बाज़ी भी है इक इबादत ही तो
आप क्यूँ इश्क़ से मुँह चुराने लगे

उनके आने का हासिल है इतना फ़क़त
हिज़्र को सोच हम जी जलाने लगे

ये न समझो के है ये कोई दांव इक
हम तो यूँ ही सनम मुस्कुराने लगे

कू-ए-जाना में कुछ ख़ास तो है के जो
पा ज़हीनों के भी डगमगाने लगे

अब डराये हैं ख़ामोशियाँ आपकी
आप ग़ाफ़िल को यूँ आज़माने लगे

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (09-03-2016) को "आठ मार्च-महिला दिवस" (चर्चा अंक-2276) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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