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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Wednesday, November 02, 2016

लुटाया भी जी आदमी आदमी पर

क़शिश तो है इसमें है यह सिरफिरी, पर
लगी आज तुह्मत मेरी दोस्ती पर

ये मंज़र तस्सवुर में लाकर तो देखो
के हो चाँद तो, गुम सी हो चाँदनी, पर

लिया गर है जी आदमी आदमी का
लुटाया भी जी आदमी आदमी पर

समझ में न आएँ गो अश्आर मेरे
तुझे तो यक़ीं हो के हैं क़ीमती, पर

ये क्या है के कहता है नफ़्रत है तुझसे,
मज़ा भी है आता तेरी बेतुकी पर

हर इक बज़्म में लोग अश्आर मुझसे
ही पढ़वा रहे आज तक आख़िरी पर

कहीं सोचकर यह के ग़ाफ़िल लिखा क्या
पटक दे न सर तू मेरी इस लिखी पर

-‘ग़ाफ़िल’

1 comment:

  1. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 03/11/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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