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सोमवार, नवंबर 28, 2016

वक़्त गुज़रा तो नहीं लौट कर आने वाला

बात क्या है के बना प्यार जताने वाला
घाव सीने में कभी था जो लगाने वाला

अब मेरे दिल में जो आता है चला जाता है क्यूँ
काश जाता न कभी याँ से हर आने वाला

ख़्वाब तो देखा मगर उसको न देखा मैं कभी
हाँ वही शख़्स था जो ख़्वाब दिखाने वाला

उसका चोरी से भी दीदार कहाँ मुम्क़िन है
जब हुआ ख़ुद का ही दिल शोर मचाने वाला

इश्क़ आतिश है मगर फिर भी नहीं उज़्र मुझे
है जो शोला ही उस आतिश पे चलाने वाला

जिसको जाना था गया पल को भी ठहरा न भले
चश्म से जाता रहा अश्क बहाने वाला

यार ग़ाफ़िल हो सँभलना तो सँभल जा अब भी
वक़्त गुज़रा तो नहीं लौट कर आने वाला

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (29-11-2016) के चर्चा मंच ""देश का कालाधन देश में" (चर्चा अंक-2541) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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