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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Thursday, November 07, 2019

सीने के आर पार है के नहीं

जी में थोड़ा ग़ुबार है के नहीं
यानी अब ऐतबार है के नहीं

रात ढलती है शम्स उगता है
आदमी ख़ुशगवार है के नहीं

शब की लज़्ज़त भी जान लोगे सुब
देख लेना ख़ुमार है के नहीं

कोई भी तौर नाम अपना रक़ीब
उसके ख़त में शुमार है के नहीं

और ग़ाफ़िल जी! तीर नज़रों का
सीने के आर पार है के नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

7 comments:

  1. बहुत अच्छा लेख है Movie4me you share a useful information.

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  2. कोई भी तौर का जवाब नहीं जनाब।
    वाह...

    मेरी नई पोस्ट पर स्वागत है👉👉 जागृत आँख 

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  3. very useful information.movie4me very very nice article

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  4. आपकी वर्णन बहुत ही स्पष्ट है। आपने एक बहुत ही शानदार कविता लिख डाली है। इस कविता के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।
    PNB HRMS for retired employees

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