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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Wednesday, December 09, 2020

हम हैं फिर प्यार का मुहूरत है


मेरी जानिब से आप सबको दो क़त्आत नज़्र किये जाते हैं मुलाहिज़ा फ़र्माएँ!

1.
है मुसन्निफ़ की कोई जाने ग़ज़ल
या मुसब्बिर की कोई मूरत है
ख़ूबसूरत फ़क़त न कहिए इसे
हुस्न तो इश्क़ की ज़ुरूरत है

2.
देखिए! ग़ौर कीजिए इसपर
बाद अर्से के ऐसी सूरत है
क्या नमूज़ी बताएगा इसको
हम हैं फिर प्यार का महूरत है

-‘ग़ाफ़िल’

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