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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Thursday, December 27, 2012

कोढ़ियों के मिस्ल होगा यह समाज

ईलाज-

राख करने के सबब ज़ुल्मो-सितम
लाज़िमी है कुछ हवा की जाय और
उस लपट की ज़द में तो आएगा ही
शाह या कोई सिपाही या के चोर

एक जब फुंसी हुई ग़ाफ़िल थे हम
रोने-धोने से नहीं अब फ़ाइदा
अब दवा ऐसी हो के पक जाय ज़ल्द
बस यही तो क़ुद्रती है क़ाइदा

वर्ना जब नासूर वो हो जाएगी
तब नहीं हो पायेगा कोई इलाज
बदबू फैलेगी हमेशा हर तरफ़
कोढ़ियों के मिस्ल होगा यह समाज

-‘ग़ाफ़िल’


13 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (28-12-2012) के चर्चा मंच-११०७ (आओ नूतन वर्ष मनायें) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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  2. आग लगी है साऱी कायनात को इन दिनों ....

    बड़ी ही मौजू रचना है भाव और शब्दों की लयात्मक ताल लिए .एक उद्देश्य लिए ,बदल दो इस रवायत को ...


    बृहस्पतिवार, दिसम्बर 27, 2012

    कोढ़ियों के मिस्ल होगा यह समाज
    ज़ुल्मो-सितम को ख़ाक करने के लिए,
    लाज़िमी है कुछ हवा की जाय और।
    उस लपट की ज़द में तो आएगा ही;
    चोर या कोई सिपाही या के और।।

    एक जब फुंसी हुई ग़ाफ़िल थे हम,
    रोने-धोने से नहीं अब फ़ाइदा।
    अब दवा ऐसी हो के पक जाय ज़ल्द;
    बस यही है इक कुदरती क़ाइदा।।

    वर्ना जब नासूर वो हो जाएगी,
    तब नहीं हो पायेगा कोई इलाज।
    बदबू फैलेगी हमेशा हर तरफ़;
    कोढ़ियों के मिस्ल होगा यह समाज।।

    नूतन वर्ष अभिनन्दन .

    Virendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.in/ बृहस्पतिवार, 27 दिसम्बर 2012 खबरनामा सेहत का



    Virendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.in/ बृहस्पतिवार, 27 दिसम्बर 2012 दिमागी तौर पर ठस रह सकती गूगल पीढ़ी

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  3. बहुत ही लाजबाब प्रस्तुति,,,,बधाई

    recent post : नववर्ष की बधाई

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  4. ak gambhir prastuti,nav varsh ki hardik badhayee

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  5. बहुत उम्दा रचना |

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  6. बहुत ही मौजू और बेहतरीन संवाद हमारे वक्त के साथ हुआ है इस रचना में इस पर सुबह भी भाई साहब टिपण्णी की थी .कहाँ यह याद नहीं .अन्यत्र शायद .

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  7. सही कहा है आपने..
    आपको सहपरिवार नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ....
    :-)

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  8. नव वर्ष शुभ और मंगलमय हो |
    आशा

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  9. बहुत प्रभावी रचना.

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  10. एक जब फुंसी हुई ग़ाफ़िल थे हम,
    रोने-धोने से नहीं अब फ़ाइदा।
    अब दवा ऐसी हो के पक जाय ज़ल्द;
    बस यही है इक कुदरती क़ाइदा।।

    wah wah ....subhanallah .....

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  11. .बधाई शानदार प्रस्तुति के लिए

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  12. तहे दिल से शुक्रिया आपकी ताज़ा टिपण्णी के लिए

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