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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Saturday, March 26, 2016

मैंने क़दम ज़रा भी बहकने नहीं दिया

इल्ज़ाम हुस्ने यार पे लगने नहीं दिया
दिल चाक हो गया पै तड़पने नहीं दिया

ठोकर लगी हज़ार मगर देखिए ज़ुनूँ
मैंने क़दम ज़रा भी बहकने नहीं दिया

सरका अगर तो सरका है मेरा वज़ूद ही
दामन हया का मैंने सरकने नहीं दिया

जलने को था मैं आतिशे हिज़्राँ में बेतरह
उम्मीदे वस्ले यार ने जलने नहीं दिया

वो इस तरह से जमके तग़ाफ़ुल रहा था कर
तीरे नज़र भी जी में उतरने नहीं दिया

ग़ाफ़िल को फ़िक़्र थी न कहीं आप डूब जायँ
और आपने उसे ही सँभलने नहीं दिया

-‘ग़ाफ़िल’

2 comments:

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (28-03-2016) को "होली तो अब होली" (चर्चा अंक - 2293) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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