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गुरुवार, मई 18, 2017

मेरी है आज तो कल तेरी भी बारी होगी

अपने गेसू की तरह तूने सँवारी होगी
तेरी ही मिस्ल तेरी बात भी न्यारी होगी

है पता बज़्म में तेरी जो चली मेरी ज़ुबाँ
फिर तो गर्दन पे मेरी चल रही आरी होगी

वक़्त अब मांग रहा आदमी होने का सुबूत
मेरी है आज तो कल तेरी भी बारी होगी

वैसे तो हिज़्र की ही रात थी दोनों की मगर
ख़ाक तू मेरी तरह रात गुज़ारी होगी

तू सताया ही नहीं मुझको कभी भी ग़ाफ़िल
तेरी यह बात मेरी ज़ीस्त पे भारी होगी

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-05-2017) को
    "मुद्दा तीन तलाक का, बना नाक का बाल" (चर्चा अंक-2634)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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