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शुक्रवार, मई 05, 2017

काश ग़ाफ़िल को कभी भी तो पुकारा होता

कोई दुनिया में न तक़्दीर का मारा होता
हर किसी को जो मुहब्बत का सहारा होता

मैं तेरे नाम की माला न जपा करता यूँ
यार तू मुझको ख़ुदा से जो न प्यारा होता

मान लेता भी के है तुझको मुहब्बत मुझसे
तीर ही नज़रों का सीने में उतारा होता

बाबते इश्क़ मेरी शोख़ तमन्नाओं पर
थे चले संग चला काश के आरा होता

मेरी आवारगी इस तर्ह न बढ़ जाती अगर
तू भले गुल से ही पर खेंच के मारा होता

थोड़ा सा अश्क जो लोगों पे लुटा देता तो
बात पक्की है समंदर न यूँ ख़ारा होता

तू पुकारा तो ज़माने को मगर क्या हासिल
काश ग़ाफ़िल को कभी भी तो पुकारा होता

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-05-2017) को
    "आहत मन" (चर्चा अंक-2628)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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