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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Wednesday, May 20, 2020

बीच रस्ते मील का पत्थर पुराना आ गया

हाँ मुझे बातें बनाना मैंने माना आ गया
उसको भी तो तानों का थप्पड़ चलाना आ गया

शम्स की ताबानी का फ़िक़्र अब नहीं है मुझको फिर
गाँव के बरगद का सर पे शामियाना आ गया

क़ाश! मेरे सर पे भी होता कोई ग़म का पहाड़
हर तरफ़ ग़मख़्वार हैं ऐसा ज़माना आ गया

दूर बिल्कुल भी नहीं थी मंज़िल अबके हाय पर
बीच रस्ते मील का पत्थर पुराना आ गया

है रुआबे पा के उसपर झुक रहे सर ख़ुद-ब-ख़ुद
झूठ है ग़ाफ़िल के तुझको सर झुकाना आ गया

-‘ग़ाफ़िल’

3 comments:

  1. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 27 मई 2020 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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