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शनिवार, दिसंबर 26, 2015

तूफ़ाँ से भी डरना क्या आएँगे व जाएँगे

ग़म थोड़े बहुत यूँ तो तुमको भी सताएँगे
पर हुस्न का जल्वा है सब हार के जाएँगे

कोई भी नहीं अपना पर फ़िक़्र नहीं कुछ भी
करना है जो हमको वह हम करके दिखाएँगे

यूँ हुस्न के दीवाने माना के हज़ारों हैं
पर इश्क़ बिना वे सब क्या लुत्फ़ मनाएँगे

जाता है किसी का क्या जो शोर मचाते सब
आदत की है मज़्बूरी हम प्यार निभाएँगे

चलते ही रहो प्यारे मंज़िल है अगर पानी
तूफ़ाँ से भी डरना क्या आएँगे व जाएँगे

इस इश्क़े बियाबाँ से ग़ाफ़िल ही गुज़रता है
क्या आप सभी सब कुछ जानेंगे तो आएँगे

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (27-12-2015) को "पल में तोला पल में माशा" (चर्चा अंक-2203) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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