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गुरुवार, अक्तूबर 13, 2016

जी मैंने अपना पुख़्ता कराया नहीं कभी

गो सर पे मेरे कोई था साया नहीं कभी
यह शम्स फिर भी मुझको सताया नहीं कभी

मेरा भी हक़ है तेरी इनायत पे ऐ ख़ुदा
पीता हूँ क्या इसीलिए पाया नहीं कभी

मालूम है के है ये गुनाहे अज़ीम, जो
बज़्मे क़दह में तुझको बुलाया नहीं कभी

ताउम्र हूँ मनाया मुहर्रम ही यार पर
भूले से भी वो गीत मैं गाया नहीं कभी

दुनिया फ़रेबियों से भरी है, तू कह रहा
पर तूने ख़ुद का नाम गिनाया नहीं कभी

उस ज़ख़्म का हो गर तो भला कैसे हो इलाज़
टीसे तो, पर जो होता नुमाया नहीं कभी

आतिशजनों को हो न परेशानी इस सबब
जी मैंने अपना पुख़्ता कराया नहीं कभी

दिल तोड़ना बस एक ही झटके में, जाने क्यूँ
ग़ाफ़िल को तूने यार सिखाया नहीं कभी

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (14-10-2016) के चर्चा मंच "रावण कभी नहीं मरता" {चर्चा अंक- 2495} पर भी होगी!
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. दुनिया फ़रेबियों से भरी है, तू कह रहा
    पर तूने ख़ुद का नाम गिनाया नहीं कभी
    - बहुत ख़ूब !

    उत्तर देंहटाएं