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रविवार, अक्तूबर 16, 2016

इश्क़ में भी था नशा क्या, दोस्तो!

है मेरा जो हाल ख़स्ता दोस्तो!
इश्क़ मैंने भी किया था दोस्तो!!

आज मेरे इश्क़ का हर एक राज़
सामने सबके खुलेगा दोस्तो!

लड़खड़ाते थे मेरे पा बिन पिए
इश्क़ में भी था नशा क्या, दोस्तो!

क्या जला, क्या रह गया, कैसे कहे
आतिशे उल्फ़त में डूबा, दोस्तो!

अब दिखा तूफ़ान बह्रे इश्क़ का
आ चुका तो था कभी का दोस्तो!

ज़ीस्त उसकी है जो कुछ सोचे बग़ैर
इश्क़ में डूबा सरापा दोस्तो!

देखिएगा लोग बोलेंगे ज़ुरूर
यह के ग़ाफ़िल याद आया दोस्तो!

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (18-10-2016) के चर्चा मंच "बदलता मौसम" {चर्चा अंक- 2499} पर भी होगी!
    शरदपूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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