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सोमवार, फ़रवरी 27, 2017

तू नहीं होता है तो कौन वहाँ होता है

ढूँढा करता हूँ जहाँ तेरा निशाँ होता है
अब बता तू ही के तू यार कहाँ होता है

तेरे पीछे मैं चला जाता हूँ सहरा सहरा
शब को भी गर तू ख़यालों में अयाँ होता है

गो है तूने ही दिया पर हो तुझे क्यूँ एहसास
हाँ वही दर्द मुझे जितना जहाँ होता है

आह भरते हैं कई नाम तेरा ले लेकर
यह तमाशा भी सरे शाम यहाँ होता है

ख़ुश्बू तेरी सी ही आती है जहाँ से ग़ाफ़िल
तू नहीं होता है तो कौन वहाँ होता है

-‘ग़ाफ़िल’

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उम्दा | बहुत समय बाद लेखन और ब्लॉग जगत में अपनी उपस्थिति दे रहा हूँ |मेरी ब्लॉग पोस्ट पर आपकी टिप्पणी और सुझाव का अभिलाषी हूँ |

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-03-2017) को
    "खिलते हैं फूल रेगिस्तान में" (चर्चा अंक-2602)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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