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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Tuesday, August 11, 2020

पुर्ज़ा पुर्ज़ा हो गया

क्या हुई तेरी नज़र तिरछी के क्या क्या हो गया
कोई साँस अटकी कोई दिल पुर्ज़ा पुर्ज़ा हो गया

जी आवारा मेरा कुछ यूँ रह रहा अब मेरे साथ
ये भी सुह्बत में तेरी तेरे ही जैसा हो गया

मैं बहुत ही शाद हूँ और हाँ रक़ीबों का मेरे
जानता हूँ तेरे दिल में आना जाना हो गया

मुझको लगता है के इश्क़ अपना भी बेमानी ही है
देखता हूँ ये भी कितना तेरा मेरा हो गया

टूटते रिश्ते की ग़ाफ़िल फ़िक़्र भी गर हो तो क्यूँ
शह्र में जब मजनूँ वाला अपना रुत्बा हो गया

-‘ग़ाफ़िल’

5 comments:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 12 अगस्त 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. बढ़िया नज़्म

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  3. जी आवारा मेरा कुछ यूँ रह रहा अब मेरे साथ
    ये भी सुह्बत में तेरी तेरे ही जैसा हो गया ।
    - अत्यंत भावपूर्ण पंक्तियाँ । उम्दा रचना । सराहनीय प्रस्तुति । श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई ।

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  4. वाह!!!
    लाजवाब सृजन।

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