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मंगलवार, दिसंबर 05, 2017

जाने दे

ढल चुकी रात, है आग़ाज़े सहर, जाने दे!
राह पुरख़ार है माना के, मगर जाने दे!!

तुझसे तो होगा ही इक दिन ऐ नसीब इत्तेफ़ाक़
रुक मेरे जज़्बों को थोड़ा तो ठहर जाने दे

कुछ तो थी बात के आते ही मेरे पहलू में
नाज़ो अंदाज़ से बोला था क़मर, जाने दे!!

होश में आऊँगा फिर घर भी चला जाऊँगा
पी जो मय होंटों की उसका तो असर जाने दे

आतिशे इश्क़ में ग़ाफ़िल! न कहीं जल जाए
ख़ूबसूरत सा मेरे दिल का नगर, ...जाने दे!!

-‘ग़ाफ़िल’

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