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Friday, September 14, 2018

कौन अब वादा वफ़ा करता है

क्या कुछ इंसान भला करता है
जो भी करता है ख़ुदा करता है

हो मुहब्बत के हो नफ़्रत की कशिश
जी को मौला ही अता करता है

उसने भी घूरके मुझको देखा
उससे जब पूछा के क्या करता है

तू न आए पै तेरे डर से अजल
आदमी रोज़ मरा करता है

मुझसे तक़्दीर मेरी रोज़-ब-रोज़
कोई तो है जो जुदा करता है

क्यूँ नहीं करता है मेरा कुछ अगर
तू ही नुक़्सानो नफ़ा करता है

है कठिन यूँ भी नहीं ग़ाफ़िल पर
कौन अब वादा वफ़ा करता है

-‘ग़ाफ़िल’

2 comments:

  1. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १७ सितंबर २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



    आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति हमारा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'

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