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मंगलवार, जून 14, 2011

अपनी है तरफ़दारी मग़र ग़ैर की करे

जी की उड़ान जैसे नक़्ल तैर की करे
है मेरा तर्फ़दारी मगर गैर की करे

जाना से यकज़बाँ मैं कभी हो नहीं सका
मैं सर की कहूँ और वो है पैर की करे

सीनःफ़िगार मुझसा और कौन हो भला
के वस्ल की शब बात भी वो ग़ैर की करे

वो जाँसिताँ है और मैं जाँबर नहीं हूँ यार!
देखें के कौन आके मेरी ख़ैर की करे

हुस्नो-हरम पे जाँनिसार हो रहा है क्यूँ
ग़ाफ़िल तू जाके सैर किसी दैर की करे

(तैर= परिन्दा, यकजबाँ= सहमत, जाना= प्रेमिका, बारहा= अक्सर, सीनःफ़िगार= टूटे हुए दिलवाला, वस्ल की शब= मिलन की रात, ग़ैर= दूसरा, जाँसिताँ= जान लेने वाली, जाँबर= जान बचाने का सामर्थ्य रखने वाला, हुस्न= सौन्दर्य, हरम= अन्तःपुर, जाँनिसार= जान न्योछावर कर देने वाला, दैर= बुतख़ाना, मूर्ति-घर)

-‘ग़ाफ़िल’

15 टिप्‍पणियां:

  1. जी की उड़ान जैसे नक़ल तैर की करे।
    अपना तो है मग़र सुलूक ग़ैर की करे।।


    -वाह!!! बेहतरीन रचना...दाद कबूलें.

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  2. जी की उड़ान जैसे नक़ल तैर की करे।
    अपना तो है मग़र सुलूक ग़ैर की करे।।
    सीनःफ़िगार मुझसा और कौन हो भला?
    के वस्ल की शब बात भी वह ग़ैर की करे।

    छोटी बहर की ख़ूबसूरत और मुकम्मल ग़ज़ल....... निःशब्द कर दिया है मुझे....आभार ....

    कभी मेरे ब्लाग ghazalyatra.blogspot.com पर भी आयें....

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  3. मैं हो न सका यकज़बाँ जानाँ से बारहा,
    मैं सर की कहूँ और के वह पैर की करे।
    ....मुझे तो इस गज़ल का यह शेर बड़ा प्यारा लगा।

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  4. वह जाँसिताँ है और मैं जाँबर नहीं हूँ यार!
    देखें के कौन आ के मेरी ख़ैर की करे।
    udru seekhne ki khwaish rakhne walo ke liye utkrist kriti

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  5. 'के वस्ल की शब बात भी वह ग़ैर की करे' च...च...च...
    बहुत सुन्दर रचना...

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  6. अपना है तरफ़दारी मग़र ग़ैर की करे

    क्या बात है...

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  7. वाह एक एक शेर उम्दा ... बेमिशाल ... आइएए दोस्ती पक्की करें शीर्षक में हमने भी अपना नाम जोड़ लिया... :)

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  8. बहुत खूबसूरत... सभी शेर शानदार
    सादर बधाई।

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  9. बहुत उम्दा गज़ल है ! यह अच्छा है कि आप मुश्किल शब्दों के मायने नीचे दे देते हैं ! हम जैसे कम उर्दू जानने वालों के लिए आसानी हो जाती है ! आभार आपका !

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  10. सीनःफ़िगार मुझसा और कौन हो भला?
    के वस्ल की शब बात भी वह ग़ैर की करे।

    खुदा खैर करे ................

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  11. हुस्नो-हरम पे जाँनिसार हो रहा है क्यूँ?
    ग़फ़िल तू जाके सैर किसी दैर की करे।।

    ....बहुत खूब! हरेक शेर बहुत उम्दा..बेहतरीन गज़ल..

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  12. behtareen, kya khoob जी की उड़ान जैसे नक़्ल तैर की करे।
    अपनी है तरफ़दारी मग़र ग़ैर की करे।।

    मैं हो न सका यकज़बाँ जानाँ से बारहा,
    मैं सर की कहूँ और के वह पैर की करे।

    उत्तर देंहटाएं