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गुरुवार, जून 30, 2011

वो तेरी कब थी दीवानी

फ़ज़ाएं मस्त मदमाती, अदाएं शोख दीवानी।
ये हूरों की सी महफ़िल है नज़ारा है परिस्तानी।।

घनी काली घटाओं में खिला ज्यूँ फूल बिजली का,
घनेरे स्याह बालों में चमकते रुख हैं नूरानी।

कशिश कैसी के बेख़ुद सा चला जाए वहीं पर दिल,
जहाँ ललकारती सागर की हर इक मौज़ तूफ़ानी।

भला ये ज्वार कैसा है नशा-ए-प्यार कैसा है,
हुआ जो ज़ुल्फ़ ज़िन्दाँ में क़तीले-चश्म जिन्दानी।

ऐ ग़ाफ़िल ख़ुद के जन्नत से जहाँ को ख़ुद किया दोज़ख,
हुआ तू जिसका दीवाना वो तेरी कब थी दीवानी।।

(जिन्दाँ=क़ैदख़ाना, क़तीले-चश्म=नज़र से क़त्ल किया गया हो जो, ज़िन्दानी=क़ैदी)

-‘ग़ाफ़िल’

26 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामीजून 30, 2011 5:19 pm

    बहुत उम्दा दर्जे के शेर |
    बधाई ||

    ravikar

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  2. इस प्रवाहमय ग़ज़ल को पढ़कर दिल प्रसन्न हो गया।

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

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  4. भला ये ज्वार कैसा है नशा-ए-प्यार कैसा है,
    हुआ जो ज़ुल्फ़ ज़िन्दाँ में क़तीले-चश्म जिन्दानी।


    बहुत खूब ... सुन्दर गज़ल

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  5. शारूत्री जी! मेरी इस अमानत को आपकी पारखी नज़र ने क़ाबिले-ग़ुफ़्तगू समझा बहुत-बहुत शुक़्रिया, मैं सोचता था कि इस ख़ुशनसीबी की हक़दार मेरी अमानत अब होगी भी या नहीं... सो आज मैं बहुत ही ख़ुश हूँ। पुन: आभार
    एक बार संगीता जी की दया हुई थी मेरी अमानत पर उनका भी बहुत-बहुत आभार

    -ग़ाफ़िल

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  6. जहां ललकारती सागर की हर एक मौज तूफानी .बहुत खूब नया नदाज़ .

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  7. घनी काली घटाओं में खिला ज्यूँ फूल बिजली का,
    घनेरे स्याह बालों में चमकते रुख हैं नूरानी।

    sunder ghazal

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  8. बेहतरीन शेरर हैं ग़ज़ल के !

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  9. भला ये ज्वार कैसा है नशा-ए-प्यार कैसा है,
    हुआ जो ज़ुल्फ़ ज़िन्दाँ में क़तीले-चश्म जिन्दानी।

    katile chasm hi har aashik ki khawish hoti hai..phir zulf zinda mein ho katal to kya baat hai sir kalpna ki ja sakti hai..is ghazal ki khasiyat iske lajabad sher aur .. aur iska prabah hai..hardik badhaiyi

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  10. घनी काली घटाओं में खिला ज्यूँ फूल बिजली का

    waah ...
    phool bijli ka ... !
    misraa,
    apni misaal aap ban gayaa hai waah !!
    ek shaandaar gzl ke liye
    mubarakbaad qubool farmaaeiN .

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  11. आप सभी कद्रदानों को बहुत-बहुत शुक्रिया

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  12. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (02.07.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  13. bahut sunder gajal.aek lafj chun ke likhe hain.bahut bahut badhaai aapko.

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  14. भला ये ज्वार कैसा है नशा-ए-प्यार कैसा है,
    हुआ जो ज़ुल्फ़ ज़िन्दाँ में क़तीले-चश्म जिन्दानी।

    --"kya baat hai guru"

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  15. बहुत खूब बेहतरीन ग़ज़ल ...

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  16. chandrbhooshan ji -bahut khoob likha hai aapne .aapke blog ka parichay ''http://yeblogachchhalaga.blogspot.com'' par prastut kiya gaya hai .aap is URL par aakar anugraheet karen .aabhar

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  17. ऐ ग़ाफ़िल ख़ुद के जन्नत से जहाँ को ख़ुद किया दोज़ख,
    हुआ तू जिसका दीवाना वो तेरी कब थी दीवानी।।
    bahut sundar abhivyakti.badhai.

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  18. 'घनी काली घटाओं में खिला ज्यों फूल बिजली का

    घनेरे स्याह बालों में चमकते रुख हैं नूरानी '

    ..............वाह गज़ब का शेर

    .........खुबसूरत रूमानी ग़ज़ल

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  19. सत्यम जी आपको बहुत-बहुत धन्यवाद जो आपने मरी यह रचना आज भी चर्चामंच पर लगाई

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  20. बहुत ही खूबसूरत,बेहतरीन ग़ज़ल

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