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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Saturday, January 23, 2016

वो किसी से टूटकर जब प्यार करके आ गये

एक ग़ज़ल यह-

मतला-
आज फिर वो इश्क़ का इज़हार करके आ गये
ज़िन्दगी इस क़द्र भी दुश्वार करके आ गये

अश्आर-
यूँ नहीं वो थे मगर कुछ तो हुआ जो आज दिल
नज़्रे आतिश शौक से सरकार करके आ गये

वो गये थे इश्क़ के बीमार का करने इलाज़
और अपने-आपको बीमार करके आ गये

जो मेरी तक़्दीर थी मंज़ूर थी मुझको मगर
वो मेरी जानिब से क्यूँ इंकार करके आ गये

क्या पता के यूँ था छाया कौन सा उन पर सुरूर
जो रक़ीबों से नज़र दो चार करके आ गये

आईना चेहरे की रौनक़ देखकर हैरान था
वो किसी से टूटकर जब प्यार करके आ गये

इसी ज़मीन पर ग़ज़ल के मिजाज़ से ज़रा हटकर बाद में बना एक शे’र-
चाँद की रोटी बना जज़्बा जलाया सेंक ली
और समझे देश का उद्धार करके आ गये

मक़्ता-
शर्म ग़ाफ़िल जी ज़रा भी तो उन्हें आई नहीं
हुस्न को रुस्वा सरे बाज़ार करके आ गये

-‘ग़ाफ़िल’

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर नायाब प्रस्तुति।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (25-01-2016) को "मैं क्यों कवि बन बैठा" (चर्चा अंक-2232) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. जो मेरी तक़्दीर थी मंज़ूर थी मुझको मगर
    वो मेरी जानिब से क्यूँ इंकार करके आ गये
    ...........

    आईना चेहरे की रौनक़ देखकर हैरान था
    वो किसी से टूटकर जब प्यार करके आ गये
    ...... बेहतरीन .....

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