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शनिवार, जनवरी 30, 2016

पसे मुद्दत मेरे क़ातिल ने मुझको फिर बुलाया है

वो मेरे प्यार के जज़्बे को यूँ भी आजमाया है
मुख़ातिब भी रहा है पर न कोई जुल्म ढाया है

बड़ा छुपता रहा है बादलों का साथ पा करके
मेरी चाहत ही थी जो चाँद अब पूरा नुमाया है

हटो! दामन मेरा छोड़ो! मुझे जाना है, जाने दो!
पसे मुद्दत मेरे क़ातिल ने मुझको फिर बुलाया है

चलो है मर्तबा क़ायम यूँ मेरी मैफ़रोशी का
मेरा क़ातिल डुबाकर मै में ही खंज़र जो लाया  है

गो है ये मस्‌अला छोटा मगर आसाँ नहीं है के
कोई ख़ुश्बू को कब तक बन्द करके रोक पाया है

न कुछ भी यूँ है जो के हो नहीं सकता इशारों से
इशारों ने भले चंगे को भी ग़ाफ़िल बनाया है

-‘ग़ाफ़िल’

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