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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Sunday, January 24, 2016

यह भी खाली मकान है शायद

मेरी आफ़त में जान है शायद
उसका बीता ईमान है शायद

क्या तेरे दिल में आशियाँ कर लूँ
यह भी खाली मकान है शायद

उसकी पकवान लग रही फ़ीकी
उसकी ऊँची दुकान है शायद

इश्क़ सामान है तिज़ारत का
उसको ऐसा ग़ुमान है शायद

उड़ रही धूल जो, इसी रस्ते
कोई गुज़रा जवान है शायद

जाम है रोड इश्क़ वालों से
हुस्न का ये सीवान है शायद

अर्जमंद हो गया ये ग़ाफ़िल भी
दिल तेरा मिह्रबान है शायद

-‘ग़ाफ़िल’

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