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शनिवार, मार्च 18, 2017

रब का नहीं तो तेरा ही चेहरा दिखाई दे

बन ठन के तू न यार तमाशा दिखाई दे
मैं चाहता हूँ जैसा है वैसा दिखाई दे

चाहेगा जिस तरह भी दिखाई पड़ूँगा मैं
पर तू कभी कभार ही अच्छा दिखाई दे

मिल पाएगा न ऐसे तो इंसाफ़ मेरे दिल
या जो सितम हुआ है ज़रा सा दिखाई दे

मझधार में ही नाव मेरी कब से है ख़ुदा
अब चाहिए मुझे भी किनारा दिखाई दे

लगता नहीं है फ़र्क़ ज़रा भी मुझे सनम
रब का नहीं तो तेरा ही चेहरा दिखाई दे

अच्छा लगेगा मुझको भी तुझको भी शर्तिया
मेरे वज़ूद का तू जो हिस्सा दिखाई दे

पत्थर उछालना के चला देना तेग़ ही
ग़ाफ़िल जो तेरे कू से गुज़रता दिखाई दे

-‘ग़ाफ़िल’

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19-03-2017) को

    "दो गज जमीन है, सुकून से जाने के लिये" (चर्चा अंक-2607)

    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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