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रविवार, नवंबर 08, 2015

मेरे घर उस रात का मौसम सुहाना हो गया

चाँद का जिस रात भी खिड़की पे आना हो गया
मेरे घर उस रात का मौसम सुहाना हो गया

लग रहा है फिर फ़ज़ाओं में है लैला की महक़
क्यूँके यारो कैस अपना फिर दीवाना हो गया

आदतन मैं मुस्कुरा देता हूँ बस इतने से तुम
बारहा क्यूँ मान लेते हो मनाना हो गया

जैसे तैसे हुस्न के वन में यक़ीं की झाड़ पर
इश्क़ का मेरे भी लो अब आशियाना हो गया

शोख़ नज़रों ने ही कुछ मुझको किया बर्बाद और
अब उन्हीं से जी का जी लगना लगाना हो गया

क्या पता ग़ाफ़िल ज़माने से है ग़ाफ़िल या के फिर
आज कल ग़ाफ़िल से ही ग़ाफ़िल ज़माना हो गया

-‘ग़ाफ़िल’

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