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सोमवार, अगस्त 14, 2017

भला मैं किस तरह ज़िन्दा रहूँगा

मुझे लगता नहीं अच्छा रहूँगा
यूँ तेरे कू में गर आता रहूँगा

अड़ा है तू न मिलने की ही ज़िद पर
न जानूँ मैं के अब कैसा रहूँगा

तू यूँ ही तैरने आता रहे मैं
क़सम से उम्र भर दर्या रहूँगा

भले ही जाम टकराता हूँ शब् भर
मैं तेरी दीद का प्यासा रहूँगा

नसीब अब हो ही जाए हाथ इक दो
तू है बादिश तो मैं इक्का रहूँगा

रहा महरूम गर शिक़्वों से तेरे
भला मैं किस तरह ज़िन्दा रहूँगा

सँवारूँगा मैं किस्मत तेरी ग़ाफ़िल
भले टूटा हुआ तारा रहूँगा

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, श्री कृष्ण, गीता और व्हाट्सअप “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत ख़ूब ... लाजवाब शेर और कमाल की ग़ज़ल

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