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सोमवार, नवंबर 16, 2015

औ मुसन्निफ़ भी तो कोई व्यास होना चाहिए

फिर कोई इक कृष्ण सा बिंदास होना चाहिए
औ मुसन्निफ़ भी तो कोई व्यास होना चाहिए

मैं चला आऊँगा दौड़ा दे कोई आवाज़ पर
शर्त इतनी है के मक़सद ख़ास होना चाहिए

मौत भी मेरी ग़ज़ल बन जाएगी ये है यक़ीं
बस मेरा दिलदार मेरे पास होना चाहिए

ज़ोर तो जल्वानुमा होगा मुहब्बत का मगर
आदमीयत का हमें अहसास होना चाहिए

जी रहे अभिशप्त पादप से कई संसार में
क्या नहीं उनके लिए मधुमास होना चाहिए

ख़ूबसूरत आप हैं अहसास हो जाएगा बस
आईने पे आपका विश्वास होना चाहिए

आप ग़ाफ़िल जी कहो क्या इश्क़ करने के लिए
लाज़िमी है ज़ेब में सल्फ़ॉस होना चाहिए?

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (18-11-2015) को "ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री" (चर्चा-अंक 2164) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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