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शुक्रवार, नवंबर 06, 2015

एक ग़ाफ़िल की हैं यूँ भी दुश्वारियाँ

आतिशे इश्क़ ज़ारी रहे दरमियाँ
इस सबब है जला फिर मिरा आशियाँ

आज फिर इश्क़बाज़ों की चाँदी हुई
आज फिर गुल हुईं शह्र की बत्तियाँ

लज़्ज़ते इश्क़ का शौक गर है तुझे
माफ़ करती रहे मेरी ग़ुस्ताख़ियाँ

अब रहा एक बस ख़्वाब का आसरा
वस्ल में गर रहीं यूँ परेशानियाँ

बल्लियों मैं उछलना गया भूल, जब
देख उसको उछलने लगीं बल्लियाँ

क्यूँ किसी को सुनाई नहीं पड़ रहीं
आ रहीं जो उजालों से सिसकारियाँ

जब चला उसके दर छींक कोई दिया
एक ग़ाफ़िल की हैं यूँ भी दुश्वारियाँ

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

  1. siyaahe-shabb sisak ke kah rahii ..,
    ki chrage-gul pe chalii hin ariyaan.....

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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