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शुक्रवार, मई 06, 2016

इश्क़बाज़ों को भला काम की फ़ुर्सत है क्या

दर्द देने की मुझे तेरी भी फ़ित्रत है क्या
मेरे जज़्बात से तुझको भी अदावत है क्या

मुझको रुस्वा जो किया इश्क़ में करता हूँ मुआफ़
देख पर पास तेरे थोड़ी भी इज़्ज़त है क्या

इश्क़ मैंने है किया जिससे वही बुत ठहरा
कोई बोले तो सही यह भी इबादत है क्या

इश्क़बाज़ी की मेरे चर्चा सरेआम हुई
है ये तारीफ़ नहीं तो फिर ये तुह्मत है क्या

जो लपट सी है उठी जाये मेरे सीने में
है न तेरी तो फिर दुनिया की इनायत है क्या

लोग उम्मीद लगाए हैं ग़ज़ब ग़ाफ़िल से
इश्क़बाज़ों को भला काम की फ़ुर्सत है क्या

-‘ग़ाफ़िल’

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (07-05-2016) को "शनिवार की चर्चा" (चर्चा अंक-2335) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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