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मंगलवार, मई 10, 2016

फूल ग़ाफ़िल जी खिले भी ख़ूब थे

चश्म तर थे पर लड़े भी ख़ूब थे
याद है क्या हम मिले भी ख़ूब थे

मंज़िले उल्फ़त रही हमसे जुदा
गो के उस जानिब चले भी ख़ूब थे

नाज़नीं का रुख़ समझ कर चाँद हम
वक़्त था जब देखते भी ख़ूब थे

था चढ़ा भी इश्क़ का सर पे जुनून
और फ़र्माते डरे भी ख़ूब थे

जिस्म दो इक हो न पाए उम्र भर
गो दिलोंं में राबिते भी ख़ूब थे

ख़ुश्बुओं से था चमन महरूम और
फूल ग़ाफ़िल जी खिले भी ख़ूब थे

-‘ग़ाफ़िल’

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 11 मई 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (11-05-2016) को "तेरी डिग्री कहाँ है ?" (चर्चा अंक-2339) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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