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शनिवार, मई 28, 2016

हम संभल गये

कल क्या थे और आज वो कितना बदल गये
गिरगिट से भी जनाब कुछ आगे निकल गये

जी में हमारे आग लगाने को मोहतरम
आए हज़ार बार मगर खुद ही जल गये

देखा जो जामे चश्म तो फिर आ गया क़रीब
और ये हुआ के तीरे नज़र दिल पे चल गये

रोना भी यार अपना ग़ज़ब दे गया नफ़ा
जी में थे जो मलाल सब अश्कों में ढल गये

कुछ और ही तरह से अनासिर का अस्र है
जोे आप भी तो चाँद के आते पिघल गये

कल की न बात कीजिए मालूम भी है क्या
आया तो एक भी न मगर कितने कल गये

ग़ाफ़िल जी राजे इश्क़ यहाँ फ़ाश यूँ हुआ
वे तो नज़र गिराए मगर हम सँभल गये

अनासिर=पंचभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश)
-‘ग़ाफ़िल’

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