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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Tuesday, January 10, 2017

नज़र अपना निशाना जानती है : दो क़त्आ

1.
जो अपना सब गँवाना जानता है
वो अपना हक़ भी पाना जानता है
फँसाओगे उसे क्या जाल में तुम
जो हर इक ताना बाना जानता है
2.
किसी पे क़ह्र ढाना जानती है
तो महफ़िल भी सजाना जानती है
न बातों से इसे तुम बर्गलाओ
नज़र अपना निशाना जानती है

-‘ग़ाफ़िल’

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