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शनिवार, जनवरी 14, 2017

चाँद के भी पार होना चाहिए

ठीक है व्यापार होना चाहिए
फिर भी लेकिन प्यार होना चाहिए

मुझको आने को बतौरे चारागर
कोई तो बीमार होना चाहिए

आप हों या मैं मगर इस बाग़ का
एक पहरेदार होना चाहिए

दरमियाने दिल है तो फ़िलवक़्त ही
प्यार का इज़हार होना चाहिए

शर्म तो आती है फिर भी एक बार
चश्म तो दो चार होना चाहिए

हम न मिल पाएँ भले पर जी में रब्त
दोस्त आख़िरकार होना चाहिए

अब तो ग़ाफ़िल हौसिले का अपने रुख़
चाँद के भी पार होना चाहिए

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (15-01-2017) को "कुछ तो करें हम भी" (चर्चा अंक-2580) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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