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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Sunday, January 15, 2017

सब

निकल पाएगा दस्तो पा भला कैसे फँसा है सब
मुझे यह इश्क़ो चाहत क़ैद जैसा लग रहा है सब

कभी बह्रे मुहब्बत में अगर डूबे तो बोलोगे
के जो डूबा कहीं पर भी उसी को ही मिला है सब

किसी से इश्क़ हो जाना फिरा करना जूँ मजनू फिर
ये दैवी आपदा सा है कहाँ अपना किया है सब

छुपे रहते हो बेजा तुम नहीं तुमको पता शायद
के है अल्लाह और उसको ज़माने का पता है सब

रहा कुछ मेरा कुछ तेरा क़ुसूर उल्फ़त निबाही में
नहीं दावे से कह सकता है ग़ाफ़िल एक का है सब

-‘ग़ाफ़िल’

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