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सोमवार, जनवरी 30, 2017

हाए!

थोड़ी अलसाई दोपहरी
कुछ नीली कुछ पीली गहरी
मुझको अपने पास बुलाए
कुछ भी समझ न आए, हाए!

लता विटप सी लिपटी तन पर
अधरों को धरि मम अधरन पर
कामिनि जिमि नहिं तनिक लजाए
कुछ भी समझ न आए, हाए!

अधर सुधा यहि भाँति पान करि
विलग हुई संध्यानुमान करि
तृप्ता मन्द मन्द मुस्काए
कुछ भी समझ न आए, हाए!

-‘ग़ाफ़िल’

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