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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Tuesday, February 18, 2020

या तेरे सीने में ग़ाफ़िल आग भर है

शम्स है सिरहाने या छत पर क़मर है
फ़र्क़ है क्या रोज़ो शब सोना अगर है

क्यूँ नहीं उठ सकती आह आख़िर ज़माने!
जो कटा शब्जी नहीं है एक सर है

नींद अगर आए न तो क्यूँकर न आए
मैं हूँ बिस्तर में ही यार और अपना घर है

गुफ़्तगू बेबाक होनी चाहिए थी
किसलिए शरमा रहा था इश्क़ अगर है

मुस्कुरा दे कुछ के जी में आए ठंढक
या तेरे सीने में ग़ाफ़िल आग भर है

-‘ग़ाफ़िल’

1 comment:

  1. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 19 फरवरी 2020 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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