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मंगलवार, मई 01, 2018

तेरे ही सबब पार्साई गई है

भले ही वो पर्दे में लाई गई है
यहाँ भी मगर बात आई गई है

तुझे चाहने वाले होंगे कई पर
फ़क़त जेब अपनी सफ़ाई गई है

ग़ज़ल तुझको अपना बनाने की ज़िद में
ही अपनी पढ़ाई लिखाई गई है

न माने तू पर सच यही है के अपनी
तेरे ही सबब पार्साई गई है

सुनाते हो ऐसे ग़ज़ल आज ग़ाफ़िल
के जैसे ये पहले सुनाई गई है

-‘ग़ाफ़िल’

(पार्साई=संयम, इंद्रिय-निग्रह, पर्हेज़गारी)

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