Tuesday, June 19, 2018

खुला खुला सा वो क्या क्या दिखा रहा है मुझे

वो अपने सीने से ऐसे लगा रहा है मुझे
के जैसे ख़्वाब था मैं सच में पा रहा है मुझे

ये हिचकियाँ हैं सनद यह के है कोई तो जो
अभी भी यादों में अपनी बुला रहा है मुझे

सितम तो ये है के जाना था और ही जानिब
मगर कहाँ वो लिए जी में जा रहा है मुझे

कहूँ मैं कैसे के किस तौर ग़मग़ुसार मेरा
मेरा ही अश्के मुक़द्दस पिला रहा है मुझे

दिखाऊँ शीशा ज़माने को किस तरह ग़ाफ़िल
खुला खुला सा वो क्या क्या दिखा रहा है मुझे

-‘ग़ाफ़िल’

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