फ़ेसबुक पर अनुसरण करें-

मेरी फ़ोटो

मेरे बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

शुक्रवार, अप्रैल 22, 2016

जो भी है तू पर कोई ग़ाफ़िल नहीं है

हुस्न शायद जो मुझे हासिल नहीं है
ख़ूब है पर इसका मुस्तक़्बिल नहीं है

जानता है ख़ासियत क्या इश्क़ की तू
इस समन्दर का कोई साहिल नहीं है

इश्क़ का आया नहीं तुझको सबक और
क्या मज़े से कह रहा मुश्किल नहीं है

क्या करें उश्शाक़ ऐसा दौर आया
रास्ते हैं लाख पर मंज़िल नहीं है

आश्नाई भी हो तो कैसे हो तुझसे
है पता जब तू कोई क़ातिल नहीं है

देखने को नाज़नीनों में है सब कुछ
और देने को ज़रा भी दिल नहीं है

कह दिया तो कह दिया, माना के जानम
शे’र तेरी बज़्म के क़ाबिल नहीं है

लोग कहते हैं करूँ क्यूँ ख़ैरमक़्दम
जो भी है तू पर कोई ग़ाफ़िल नहीं है

( मुस्तक़्बिल=भविष्य, साहिल=किनारा, बज़्म=महफ़िल, उश्शाक़=आशिक़ लोग, ख़ैरमक़्दम=स्वागत)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें