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गुरुवार, अप्रैल 13, 2017

शिक़्वा नहीं हमें है ज़रा भी गुलाब से

क्या बुझ सकी है प्यास किसी की शराब से
पाएगा कोई फ़ैज़ भी क्या मह्वेख़्वाब से

चुग़ली सी कर रहा है हमारे रक़ीब की
इक झाँकता गुलाब तुम्हारी किताब से

है रंज़ बस यही के हमारा नहीं है यह
शिक़्वा नहीं हमें है ज़रा भी गुलाब से

हर सू से ख़ुद ही आती है वर्ना हमारा क्या
है राबिता किसी की भी बू-ए-शबाब से

ग़ाफ़िल किसी को इसका भी क्या इल्म है ज़रा
मिलता मक़ाम कौन सा है इज़्तिराब से

-‘ग़ाफ़िल’

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