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शुक्रवार, अप्रैल 14, 2017

ज़रा अब देख तो ले है बचा क्या

तुझे चाहा, है हिज़्र इसकी सज़ा क्या
बता मेरी ख़ता है और क्या क्या

दहकती आग सी आँखों में तेरी
कोई अब भी तो डूबा है, जला क्या

ज़माना हो गया आतिश उगलते
ज़रा अब देख तो ले है बचा क्या

शरारा जो छुपाया था तू जी में
सवाल अब है के शोला बन उठा क्या

मेरे ख़त का था गो मज़्मून वाज़िब
नहीं मालूम है तूने पढ़ा क्या

कभी भी तो न अपने सिलसिले थे
बहारों से अब अपना सिलसिला क्या

अरे ग़ाफ़िल तू क्या क्या बक रहा है
तेरा अब होश भी जाता रहा क्या

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-04-2017) को
    "खोखली जड़ों के पेड़ जिंदा नहीं रहते" (चर्चा अंक-2619)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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