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मंगलवार, अप्रैल 04, 2017

तेरी जो लत है जी चुराने की

बेबज़ा को बज़ा बताने की
कोशिशें हो रहीं ज़माने की

ज़िन्दगी की फ़क़त है दो उलझन
एक खोने की एक पाने की

पहले आ शब गुज़ार लें मिलकर
बात सोचेंगे फिर बहाने की

मेरा भी जी चुराया होगा तू
तेरी जो लत है जी चुराने की

एक क़त्आ-

ख़ुश्बू-ओ-गुल हैं पहरेदार जहाँ
राह कोई न जाके आने की
ख़ासियत क्या बयाँ करे ग़ाफ़िल
तेरी ज़ुल्फ़ों के क़ैदख़ाने की

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (06-04-2017) को

    "सबसे दुखी किसान" (चर्चा अंक-2615)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    विक्रमी सम्वत् 2074 की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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