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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Wednesday, June 14, 2017

अब कोई और नशेबाज़ बुलाया जाए

मेरे भी सामने खुलकर कभी आया जाए
आतिशे हुस्न से मुझको भी जलाया जाए

इश्क़बाज़ों को बुरे अच्छे का हो इल्म ही क्यूँ
हमपे अब और न इल्ज़ाम लगाया जाए

खा क़सम कर ही दिया प्यार की इक रस्म अदा
तू बता और है क्या यूँ भी जो खाया जाए

है किसे होश यहाँ पी के नज़र वाली शराब
अब कोई और नशेबाज़ बुलाया जाए

जो भी ग़ुमराह किया करते हैं वो हैं अपने
यह सबक याद है कुछ और बताया जाए

रहबरी कर तो मैं सकता हूँ अपाहिज़ की भी
शर्त यह है के उसे राह पे लाया जाए

चैन जी को है मिले उसके ही दर ग़ाफ़िल जी
किस बहाने से मगर सोचिए जाया जाए

-‘ग़ाफ़िल’

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