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सोमवार, जून 05, 2017

चुभी पर मुझे तो तेरी ही नज़र है

जो रुस्वाइयों की हसीं सी डगर है
भला क्यूँ जी उस पर ही ज़ेरे सफ़र है

तेरी याद में आ तो जाऊँ मैं लेकिन
तू फिर भूल जाएगा मुझको ये डर है

हूँ मैं ही तराशा ख़ुदा जो बना तू
अरे संग इसकी तुझे क्या ख़बर है

सबक इश्क़ का बेश्तर याद करना
लगे गोया इसमें ही सारी उमर है

हूँ क़ाइल शबे वस्ल का इसलिए मैं
के यह चुलबुली है भले मुख़्तसर है

ज़माना कहे तो कहे तुझको ग़ाफ़िल
चुभी पर मुझे तो तेरी ही नज़र है

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (06-06-2017) को
    रविकर शिक्षा में नकल, देगा मिटा वजूद-चर्चामंच 2541
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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