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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Tuesday, March 27, 2018

वही बस एक मुस्काई बहुत है

कहूँ किससे के ग़म भाई बहुत है
यहाँ सबसे शनासाई बहुत है

तो क्या समझूँ इसे इक़रारे उल्फ़त
वो मुझसे आज शरमाई बहुत है

कहाँ मुम्क़िन है उसको भूल पाना
तसव्वुर में वो जो आई बहुत है

मैं सर ले लूँगा उसकी हर बलाएँ
कभी उसकी क़सम खाई बहुत है

न मैं ज़ाहिर करूँगा औरों पर यह
मगर सच है वो हरज़ाई बहुत है

एक क़त्आ-

नहीं इल्ज़ाम है उसपे ये ग़ाफ़िल
के उसके चलते रुस्वाई बहुत है
दिले नादान के लुटने पे मेरे
वही बस एक मुस्काई बहुत है

-‘ग़ाफ़िल’

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