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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Saturday, June 09, 2018

जीते के हारे : दो क़त्आ-

🌫️🌫️🚣🌫️🌫️
मुझे इश्क़ मौजों से है तो है, सो अब
कोई भी किनारा न मुझको पुकारे
हूँ मझधार में और बेहद हूँ ख़ुश मैं
गरज़ कुछ नहीं है के पहुँचूँ किनारे

-‘ग़ाफ़िल’
🌫️🌫️🚣🌫️🌫️

💝💝💝💝💝
हुज़ूर आप यूँ मोड़ लेंगे अगर मुँह
तो अफ़साने दम तोड़ देंगे हमारे
हम उल्फ़त की बाज़ी को रक्खेंगे ज़ारी
नहीं फ़र्क़ इससे है जीते के हारे

-‘ग़ाफ़िल’
💝💝💝💝💝

4 comments:

  1. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' ११ जून २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

    निमंत्रण

    विशेष : 'सोमवार' ११ जून २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के लेखक परिचय श्रृंखला में आपका परिचय आदरणीया शुभा मेहता जी से करवाने जा रहा है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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